बदलाव के नारे ठंडे पड़ रहे है,
रोटी के चक्के से लोग पीस रहे है,
यह रोज़ के शोर में बहरे हो रहे है,
सपनो की बलि से अंधे हो रहे है,
क्या हिंद को ये सब दिखायी न देता?
यह नेता कैसे इनका भविष्य उजाड़ रहे है,
कहाँ है वोह जिन्हें क़द्र है इस जहाँ की?
जिन्हें ना है हिंद पर वोह कहाँ है?